Loneliness, Hurt, Conflict... || Acharya Prashant, with youth (2015)
Acharya Prashant
सत्य के सान्निध्य से बेहतर कोई विधि नहीं || आचार्य प्रशांत (2015)
आचार्य प्रशांत
मुक्ति का पहला चरण - शरीर का सहज स्वीकार || आचार्य प्रशांत (2015)
प्रेम बाँटना ही प्रेम पाना है || आचार्य प्रशांत (2015)
सत्य के लिए साहस नहीं सहजता चाहिए || आचार्य प्रशांत (2015)
जो बिना मूल्य दिए मिले वो अमूल्य है || आचार्य प्रशांत (2015)
हमारी धारणाओं का केंद्र है अहंकार || आचार्य प्रशांत (2015)
जो योजना से नहीं मिला उसे बचाने की योजना मत बनाओ || आचार्य प्रशांत (2015)
आत्म-छवि है मिथ्या; करो आत्मा की जिज्ञासा || आचार्य प्रशांत (2015)
मुक्ति व बंधन दोनों ही में रहने के लिए मुक्त है मनुष्य || आचार्य प्रशांत (2015)
Is it necessary to have aims in life? || Acharya Prashant, with youth (2015)
Attention must be like heartbeat, continuous and quiet || Acharya Prashant,with youth (2015)
Don't try to control the mind, leave it alone to be quiet || Acharya Prashant, with youth (2015)
Worldly you may be comparable, Essentially you're beyond comparison||Acharya Prashant,with youth
दुनिया से पाने की लालसा में तुम वास्तविक से दूर हो जाते हो || आचार्य प्रशांत (2014)
Attend to the facts and your imaginations will fall in place || Acharya Prashant, with youth (2015)
एक ही तथ्य है और एक ही सत्य; दूसरे की कल्पना ही दुःख है || आचार्य प्रशांत (2015)
सत्य के अनंत रूपों को सत्य जितना ही मूल्य दो || आचार्य प्रशांत (2015)
समझे जाने की इच्छा कहीं सम्मान पाने की इच्छा तो नहीं? || आचार्य प्रशांत (2015)
कर्तव्य और धर्म जितने अलग हैं, धर्म और प्रेम उतने ही एक || आचार्य प्रशांत (2015)
काम को पूरी सच्चाई से चुनो और फिर उसमें निर्विकल्प होकर डूब जाओ || आचार्य प्रशांत(2015)
सफलता का प्रत्येक प्रयास आखिरी शांति देने में असफल रहेगा || आचार्य प्रशांत (2015)
जो तुम्हारे दिल में बसता है, उसी की बात मेरी ज़बान पर बसती है || आचार्य प्रशांत (2015)
जिन प्रभावों से मन गंदा होता है, क्यों उनके पास जाते हो? || आचार्य प्रशांत (2015)
दुनिया से मिला बस सपना था, सपने में खोया जो अपना था || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2015)
श्रद्धा न अंधविश्वास है, न आत्मविश्वास || आचार्य प्रशांत (2015)
Observing the world, one comes to the ego. Observing ego, one comes to the Self || Acharya Prashant
विश्राम मनुष्य का सहज स्वभाव और अस्तित्व का केन्द्रीय मूल्य है || आचार्य प्रशांत (2015)
तुम्हारे लिए जगत न मिथ्या है, न मिथ्या कहो || आचार्य प्रशांत (2014)
Why does one need to be reminded of his own nature? || Acharya Prashant, with youth (2015)