
आदरणीय आचार्य प्रशांतजी, सादर प्रणाम! आपकी शिक्षाओं ने मुझे जीवन को देखने का एक बिल्कुल नया दृष्टिकोण दिया है। पहले शायद मैं जीवन जीने के बजाय उसे परिस्थितियों, जिम्मेदारियों और लोगों की अपेक्षाओं के बीच गुजार रही थी; लेकिन आज मैंने स्वयं के लिए जीना सीख लिया है। आज 37 वर्ष की उम्र में भी मैंने अपने सपनों को नई उड़ान देने का साहस जुटाया है। 17 वर्षों के शिक्षा के अंतराल के बाद दोबारा महाविद्यालय में प्रवेश लेकर समाजकार्य मास्टर ऑफ सोशल वर्क की…













































