
✍️ आचार्य जी प्रणाम 🙏 नदी है तो तीर है, तृषा है तो नीर है। कभी ये रूप, कभी वो देश, तटिनी तय करे तट का वेश। नदी (अहंकार) है तो तीर (आत्मा)। मैं सोचती रही सालों से कि मैं कैसे जानूँ कि मैं हूँ कौन? एक बात, जब मैं आचार्य जी को नहीं सुनती थी, तब मुझे छुईमुई, कोमल अपने नाम से ज़्यादा ये शब्द अपने लिए भाते थे। क्यों? इसका कारण साफ था कि कोई चाहिए था जीवन में जो मुझे सहारा दे, क्योंकि मैं तो कोमल हूँ। जीवन बदलता है हमारी नीयत से। हम क्या बने बैठे ह…












































