
✍🏻 पोस्ट 19 | 15 अक्टूबर '26 💭 विषय — फ़िल्में/पुस्तकें/गीत/कला ───────────── 🔎 झूठ का साथ देना हमारी आदत कैसे बन जाता है? पहली बार झूठ का साथ देते समय झिझक हुई थी। लगा था, यह गलत है, मुझे इसके खिलाफ़ बोलना चाहिए। फिर लगा, “अभी बोल दिया तो अपना नुकसान होगा। इस बार चुप रह जाता हूँ, अगली बार बोलूँगा।” धीरे-धीरे वही चुप्पी आदत बन गई। जो बात पहले खटकती थी, अब उसका साथ देने के लिए तर्क तैयार हैं। 📖 मुक्तिबोध की कविता “मुझे पुकारती हुई पुकार” की शुरुआत है, “मुझे पुकारती हुई पुकार खो गई कहीं...” कविता में एक व्यक्ति अपने अधूरे प्रयासों और टूटे इरादों को देखता है। उसे अपने भीतर का खालीपन दिखाई देता है। लेकिन वह पुकार उसे केवल उसकी हार नहीं दिखाती। वह उसके सामने उसकी छिपी इच्छाएँ और खुद से बोले गए झूठ भी खोल देती है वे बातें, जिनसे वह अब तक बचता रहा था। 📝 कवि लिखते हैं, “पुकार ने समस्त खोल दी छिपी प्रवंचना” प्रवंचना यानी छल। इस पंक्ति को अपने जीवन की ओर मोड़कर देखें क्या हम खुद से किए जा रहे छल को पहचानते हैं? 🪞 मान लीजिए, किसी से हमारा स्वार्थ जुड़ा है। उसकी बात गलत है, यह हमें दिख भी रहा है। लेकिन सच स्वीकार किया तो उससे मिलने वाला लाभ छोड़ना पड़ेगा। इसलिए हम उसी के पक्ष में तर्क जुटाने लगते हैं, “बात इतनी गलत भी नहीं है।” फिर कभी उसका बचाव भी करने लगते हैं, “उसकी भी कोई मजबूरी रही होगी।” 🔒 जिस झूठ से अपना हित जुड़ा हो, उसे पहचानकर भी उसका साथ छोड़ना कठिन लग सकता है। हर बार अपने स्वार्थ को बचाते हुए हम उस झिझक को दबाते जाते हैं, जो हमें रुककर देखने को कहती थी। फिर कहते हैं, “मैं कर ही क्या सकता हूँ?” 🔎 सवाल बाहर के झूठ का नहीं, उसका साथ देने वाले ‘मैं’ का है। मैं क्या बचा रहा हूँ अपना लाभ, सुविधा या संबंध? क्या इन्हें बचाने के लिए अपनी चुप्पी को मजबूरी का नाम दे रहा हूँ? यह जाँच ज़रूरी है। वरना जिस चुनाव को हमने बार-बार किया, उसी को अपना स्वभाव मान बैठेंगे। 🌱 कविता का अंत केवल निराशा में नहीं होता। अँधेरे के बीच नई प्रेरणा उभरती है और बंद पक्षियों को उड़ने का रास्ता मिलता है। अपने छल को देखना पीड़ादायक हो सकता है। लेकिन उसे छिपाते रहने से बाहर आने की संभावना कैसे बनेगी? आज झूठ का साथ देकर हम कल सच के साथ खड़े होने की तैयारी कर रहे हैं, या उससे और दूर जा रहे हैं? 💬 अपने स्वार्थ के लिए बार-बार झूठ का साथ देने से क्या हो सकता है? A. आदत पड़ जाने से झूठ सही हो जाता है। B. उसका बचाव करने के लिए तर्क जुटाना आसान लगने लगता है। C. हम अपने चुनाव को मजबूरी या स्वभाव कहकर जाँचने से बच सकते हैं। D. अपने स्वार्थ और उसे बचाने वाले तर्कों को पहचानने से बदलाव की शुरुआत हो सकती है। स्रोत: मूल कविता: https://www.hindwi.org/kavita/mujhe-pukarti-hui-pukar-gajanan-madhav-muktibodh-kavita बेईमानी, आदत और चुनाव पर चर्चा: https://acharyaprashant.org/on-youtube/5700a04
















































