
अपने स्वार्थ के लिए बार बार झूठ का साथ देने से वह हमारी आदत बन जाता हे और बार बार ऐसा करने से हमारा मस्तिष्क उसी झूठ को सच मानने लगता हे । ऐसा इसलिए क्योंकि मैने इसके कई परिणाम देखे हे अपने अभी तक के जीवन में । जिस संतुष्टिपूर्ण उत्तर की मुझे आशा होती थी वह उत्तर बिल्कुल ही उसके विपरीत होता था और तो और सभी लोग जो इसका निर्णय करते हैं , जानते हैं कि यह निष्पक्ष नहीं है फिर भी पूछने पर अपने स्वार्थ को बचाने वाला उत्तर बताते हैं। क्या स्वार्थ इतना हावी होता है कि वह झूठ को भी सत्य बना दे ।



















