
✍🏻 पोस्ट 26 | 16 अगस्त '26 💭 विषय — लोकधर्म ──────── 📝 फोर्स फीडिंग: लेब्लौह की प्रथा 🎯 एक माँ अपनी 5 वर्ष की बेटी को रोज़ 16,000 कैलोरी जबरन खिलाती है, इनकार करने पर उसकी उंगली दो टहनियों के बीच दबा देती है। वह इसे यातना नहीं, प्रेम कहती है, क्योंकि उसकी नज़र में मोटा शरीर ही बेटी की शादी की गारंटी है। 📌 मॉरिटानिया में सदियों पुरानी प्रथा "लेब्लौह" इसी सोच पर टिकी है, कुछ स्रोत इसे 11वीं सदी तक ले जाते हैं। वहाँ स्थूल शरीर सुंदरता और वैवाहिक योग्यता का पैमाना माना जाता है, पतली लड़की को कमज़ोर और अवांछनीय समझा जाता है, इसलिए लड़कियों को 5 साल की उम्र से ही बड़ी मात्रा में दूध और भोजन जबरन खिलाया जाता है ताकि शरीर मोटा दिखे और अच्छे घर में शादी हो सके। ⚠️ इनकार करने पर पीटा जाता है, उंगलियाँ तोड़ी जाती हैं। एक शोध के अनुसार इस प्रथा से गुज़री लगभग 60% लड़कियों को पीटा गया और लगभग 30% की उंगलियाँ जबरन मोड़ी गईं। 🩺 रोज़ाना 14,000 से 16,000 कैलोरी खिलाई जाती है, यानी पेशेवर बॉडीबिल्डर के आहार से 4 गुना अधिक, जबकि स्वस्थ 12 वर्षीय बच्ची को केवल 1,500 कैलोरी चाहिए होती है। शोध इसे हृदय रोग और घटती गतिशीलता से जोड़ते हैं। 💔कुछ गंभीर मामलों में पेट फटने से मृत्यु तक दर्ज हुई है। लंबे समय में डायबिटीज़, उच्च रक्तचाप और किडनी रोग आम हैं, कई लड़कियाँ अब पशुओं को मोटा करने वाले हार्मोन तक लेने लगी हैं। 🏛️ पति की संपन्नता और परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा भी बेटी के शरीर से जुड़ी मानी जाती है, इसलिए मोटा शरीर पूरे परिवार की इज़्ज़त का विषय बन जाता है। 2008 के सैन्य तख्तापलट के बाद परंपरागत भूमिकाओं को फिर बढ़ावा मिला। नई पीढ़ी अब इसे धीरे-धीरे नकारात्मक दृष्टि से देखने लगी है, पर गाँवों में यह आज भी व्यापक है। 🪞 उस माँ का हाथ जो बेटी को पीटते हुए भी खिलाता जाता है, क्रूरता से नहीं, बल्कि अपनी ही अधूरी पहचान से चलता है, जो बेटी के शरीर के सहारे पूरा होना चाहती है। "बेटी पतली रही तो घर नहीं मिलेगा, मेरी परवरिश पर उंगली उठेगी", यह डर अकेली माँ का नहीं, समुदाय का साझा अहंकार है, जिसने अपनी अधूरी सुरक्षा और प्रतिष्ठा को बेटी के शरीर पर टिका दिया है। 🎭 बेटी का शरीर यहाँ अहंकार की ढांचागिरी की सामग्री बन जाता है, वह ढांचा जो व्यक्ति और समाज दोनों को यह भ्रम देता है कि उनकी पहचान सुरक्षित है। बेटी उस पहचान को चुनती नहीं, फिर भी जीवन भर ढोती है। 🔁 2008 में जब सरकार बदली और परंपरा लौटी, वही दिखा जो अहंकार हमेशा करता है, आत्म-संरक्षण। ढांचा टूटने का भय व्यक्ति में भी उतना ही गहरा है जितना पूरे तंत्र में, इसलिए परंपरा का लौट आना कोई संयोग नहीं। ❓ सवाल किसी दूर के देश का नहीं है। कहाँ मैं भी अपने शरीर या अपनी छवि को इसलिए ढो रहा हूँ क्योंकि भीतर अधूरापन ही बैठा है? देखना भर काफ़ी नहीं, उस देखने के साथ नीयत भी चाहिए। दिशा वहीं से बदलती है। 🔗 स्रोत: https://hir.harvard.edu/force-feeding-and-drug-abuse-the-steep-price-of-beauty-in-mauritania/ https://en.wikipedia.org/wiki/Leblouh
















































