
लेब्लौह में बेटी को मोटा किया जाता था ताकि शादी हो जाए… और हम कहते हैं कि जमाना बदल गया है। 😂 वहाँ लड़की के शरीर को शादी की गारंटी बनाने के लिए जबरन खिलाया जाता था, यहाँ भी मामला बहुत अलग नहीं है—बस तरीका मॉडर्न हो गया है। अब रिश्ता आए तो पिज्जा, बर्गर, पेटीज और कोक का इतिहास भी साथ आता है। कोक भी ऐसी कि ऊपर से लिखा है—“शुगर फ्री डाइट”… मतलब अपराध वही है, बस पैकेजिंग हेल्थ कॉन्शियस वाली है। 😂 फिर वजन बढ़ता है, पिंपल निकलते हैं, शरीर हमेशा डिहाइड्रेटेड रहता है… लेकिन इलाज? मेकअप! 😂 घर से निकलना हो या न हो, लिपना-पोतना चालू। चेहरे पर पिंपल हैं तो मेकअप, थकान है तो मेकअप, ग्लो नहीं है तो मेकअप— ऐसा लगता है शरीर से ज्यादा चेहरे की सामाजिक प्रतिष्ठा बचाने की चिंता है। और फिर मैं सोचता हूँ— मेरी दुल्हन आखिर मिलेगी कहाँ? एक तरफ वो समाज है जहाँ लड़की को मोटा करके शादी योग्य बनाया जाता था, दूसरी तरफ हमारा आधुनिक समाज है जहाँ लड़की को जंक फूड, कॉस्मेटिक्स और दिखावे के बीच ऐसा ढाला जा रहा है कि शरीर भी परेशान और मन भी। मुझे तो अब ऐसी दुल्हन चाहिए जो पिज्जा देखकर खुश तो हो, लेकिन रोज का भोजन उसे पिज्जा न लगे; कोक पीए तो शौक से, पानी पीना न भूले; मेकअप करे तो करे, लेकिन बिना मेकअप आईने में खुद को देखकर भी परेशान न हो। क्योंकि समस्या मोटे या पतले शरीर की नहीं है। समस्या तब शुरू होती है जब किसी इंसान का शरीर उसकी कीमत, सुंदरता या शादी की गारंटी बन जाता है। लेब्लौह में शरीर पर समाज का दबाव था, हमारे यहाँ शरीर पर बाजार और दिखावे का दबाव है। बस जंजीर बदल गई है, शरीर पर अधिकार जमाने की आदत अभी भी बची हुई है। 😂



















