
✍🏻 पोस्ट 23 | 22 सितंबर’26 💭 विषय — फ़िल्में/गीत/पुस्तकें/कला ─────── औरत पैदा नहीं होती, औरत बनाई जाती है 🔬 विज्ञान की दृष्टि से स्त्री और पुरुष के शरीर में बहुत-सी बुनियादी समानताएँ हैं। दोनों के शरीर में हृदय, फेफड़े, मस्तिष्क, गुर्दे, हड्डियाँ, मांसपेशियाँ, रक्त और तंत्रिका तंत्र जैसी मूल संरचनाएँ होती हैं। अंतर मुख्यतः प्रजनन तंत्र, गुणसूत्रों, हार्मोन के स्तर और उनसे जुड़ी कुछ शारीरिक विशेषताओं में होते हैं। ❓ फिर समाज बचपन से ही दोनों के लिए इतनी अलग दुनिया क्यों बना देता है? 📖 सिमोन द बोउवार अपनी किताब द सेकंड सेक्स में इसी अंतर को खोलती हैं। 1949 में प्रकाशित इस किताब की प्रसिद्ध पंक्ति है: “औरत पैदा नहीं होती, औरत बनती है।” यानी स्त्री शरीर लेकर पैदा होना एक बात है और समाज द्वारा उसे एक खास तरह की स्त्री के रूप में ढाला जाना दूसरी बात। 👧 यह ढलना बचपन से शुरू हो जाता है। कई समाजों में लड़के को बाहर जाकर खेलने, पेड़ पर चढ़ने, शरीर से दुनिया को आज़माने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। लड़की को अपने शरीर को संभालकर रखने, अच्छा दिखने और दूसरों को प्रसन्न करने की शिक्षा मिलती है। खिलौनों से लेकर कपड़ों, बैठने के तरीके, बोलने के ढंग और आगे चलकर शादी, परिवार और मातृत्व तक, उसके लिए एक खास भूमिका तैयार होती जाती है। फिर इन्हीं व्यवहारों को “नारी स्वभाव” कह दिया जाता है। जो बात वर्षों तक सिखाई गई हो, उसे व्यक्ति खुद भी अपना स्वभाव मानने लग सकता है। सजना, घर संभालना, चुप रहना या दूसरों को पहले रखना उसे अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति लगने लगती है। इस तरह सामाजिक रूप से सिखाई गई भूमिका धीरे-धीरे अपनी प्रकृति जैसी दिखाई देने लगती है। 💭 इसके बाद बोउवार का एक और महत्वपूर्ण विचार आता है: स्त्री को “दूसरा” बनाना। पुरुष को सामान्य मानव का मानक मान लिया गया और स्त्री को उसके मुकाबले “दूसरा”। पुरुष कर्ता है, स्त्री उसके संदर्भ में परिभाषित होने वाली “अन्य”। बोउवार के विश्लेषण में यह “दूसरा” होना केवल नाम देने की बात नहीं, बल्कि स्त्री के पूरे जीवन को पुरुष के संदर्भ में देखने की प्रक्रिया है। ❓ किसी को “दूसरा” बनाने की जरूरत ही क्यों पड़ती है? अगर सामने वाला सिर्फ एक इंसान है, तो उसे “दूसरा” बनाकर अपने से अलग खड़ा करने की जरूरत क्यों है? और अगर मुझे अपने होने के लिए किसी दूसरे की जरूरत पड़ रही है, तो क्या मेरे अपने होने में ही कोई अधूरापन है? 🔎 यहीं से बात समाज की भूमिका से आगे बढ़कर “मैं” की संरचना तक पहुँचती है। अहंकार ही अधूरापन है। अधूरा “मैं” अपने को पूरा करना चाहता है। वह बाहर कुछ पाने, जोड़ने और भोगने के जरिए पूर्णता चाहता है। लेकिन भोग के लिए कोई “दूसरा” चाहिए, जिसे मैं अपने से अलग मानूँ। जिसे मैं पाना, इस्तेमाल करना, अपने अनुसार ढालना या अपनी तुलना में रखना चाहता हूँ, पहले उसे अपने से अलग खड़ा करना पड़ता है। इस तरह “मैं” और “दूसरा” का विभाजन पैदा होता है। तो स्त्री का “दूसरा” बनना केवल समाज द्वारा दी गई कुछ भूमिकाओं की कहानी नहीं है। उसके पीछे वह “मैं” भी देखा जा सकता है जो अपने को पूरा करने के लिए अपने से अलग किसी दूसरे को खड़ा करता है। 🪞 क्या मैं किसी इंसान को वैसा देखता हूँ जैसा वह है, या वैसा जैसा मेरा अधूरा “मैं” उसे बना देता है? स्रोत The Second Sex https://en.wikipedia.org/wiki/The_Second_Sex
















































