
जब तक आचार्य जी से नहीं जुड़ी थी तब तक तो मुझे स्त्री की वही स्थिति दिखाई देती थी जो समाज,लोकधर्म,मान्यताओं द्वारा बना दी गई है किंतु अब मैं बिल्कुल वही समझता हूं जो अध्यात्म में है "स्त्री को एक मनुष्य के रूप में ही देखा जाता है।" मैं जिस समाज मैं रहती हूं वहां स्त्रियों को अपने पति से बड़े पुरुषों से घूंघट करना पड़ता है, मुझे कबार ऐसी विकट परिस्थिति का सामना करना पड़ता है। जब मैं जाते हुए दो मनुष्यों को देखते देखती हूं जिसमें एक मनुष्य बड़ी ही आजादी से हिम्मत से आगे चल रहा है और दूसरा मनुष्य अपने सिर पर पल्लू या घूंघट रखकर चल रहा है, मुझे विचार आता है कि इसने ऐसा कौन सा गुनाह किया है जो इसे इस तरह रहने के लिए मजबूर होना पड़ता है और पुरुष ने ऐसा कौन सा तीर मार दिया कि वह स्त्री का स्वामी होने का हकदार है।



















