
युगेश्वरी साहू
"मैं " इंसान को जैसा वह है, वैसा नहीं देखता, बल्कि अपनी अपेक्षाओं, पसंद-नापसंद, पुराने अनुभवों और अधूरेपन के चश्मे से देखते हैं।
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"मैं " इंसान को जैसा वह है, वैसा नहीं देखता, बल्कि अपनी अपेक्षाओं, पसंद-नापसंद, पुराने अनुभवों और अधूरेपन के चश्मे से देखते हैं।
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