
✍🏻 पोस्ट 1 | 4 अक्टूबर '26 💭 विषय — इंडियन करंट अफेयर्स ──────── 🧒🏻 भ्रूण हत्या की शुरुआत आखिर कहाँ से होती है? मध्य प्रदेश के बड़वानी में एक कुत्ता करीब 5 महीने के भ्रूण को मुँह में दबाए घूमता मिला। भ्रूण पर अस्पताल की सील भी थी। पुलिस मामले की जाँच कर रही है। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि भ्रूण लड़की का था या लड़के का। फिर भी यह घटना एक बड़े सवाल तक ले जाती है। ❓ किसी बच्चे को जन्म लेने से पहले ही अस्वीकार करने की नौबत आखिर क्यों आती है? 📊 भारत में इसका एक गंभीर रूप लिंग-आधारित चयन है। UNFPA के अनुसार, 2013–17 के बीच भारत में हर साल लगभग 4.6 लाख लड़कियाँ जन्म के समय ‘लापता’ थीं। 📊 हाल के आँकड़ों में जन्म के समय लिंगानुपात 2015–17 के 896 से बढ़कर 2021–23 में 917 लड़कियाँ प्रति 1000 लड़के हुआ है। 🌍 यह केवल भारत तक सीमित समस्या नहीं है। UNFPA के अनुसार, दुनिया भर में बेटे की प्राथमिकता, बेटी से परहेज़ और लिंग-आधारित चयन के कारण लगभग 14.2 करोड़ लड़कियाँ ‘लापता’ हैं। 📊 सामान्यतः हर 100 लड़कियों पर लगभग 102–106 लड़कों का जन्म होता है। कुछ प्रभावित क्षेत्रों में यह अनुपात 130 लड़कों प्रति 100 लड़कियों तक देखा गया है। 🇮🇳 भारत में भी परिवार में पहले से मौजूद बच्चों का लिंग अगले बच्चे के जन्म के समय लिंगानुपात से जुड़ा पाया गया है। पहली संतान लड़की होने पर अगली संतान में पुरुष-झुकाव बढ़ता है और दो बेटियों के बाद यह और अधिक दिखाई देता है। ❓ लेकिन बेटे की चाह इतनी गहरी क्यों होती है? 👦🏻 “वंश कौन चलाएगा?” “बुढ़ापे में कौन देखेगा?” “परिवार का नाम कौन आगे बढ़ाएगा?” “मेरी मृत्यु के बाद संस्कार कौन करेगा?” 👧🏻 और बेटी के बारे में: “दहेज देना पड़ेगा।” “वह तो दूसरे घर चली जाएगी।” UNFPA इन धारणाओं को पितृवंशीय व्यवस्था, दहेज, संपत्ति में असमानता और बुढ़ापे की सुरक्षा जैसी सामाजिक-आर्थिक स्थितियों से जोड़ता है। 🪞 लेकिन यहीं से सवाल बाहर की दुनिया से भीतर की ओर मुड़ता है। अगर किसी पिता से पूछा जाए, “आपको बेटा ही क्यों चाहिए?” और वह कहे, “क्योंकि मुझे यही सही लगता है।” तो क्या यह सचमुच उसकी अपनी इच्छा है? या पीढ़ियों से चली आ रही धारणाएँ उसके माध्यम से बोल रही हैं? 🧠 हम कई बार कंडीशनिंग को अपनी इच्छा समझ लेते हैं। फिर उसी के अनुसार निर्णय लेते हैं और उसे “मेरी मर्ज़ी” कह देते हैं। ⚖️ कानून लिंग-चयन पर रोक लगा सकता है, लेकिन केवल कानून उस धारणा को नहीं बदल सकता जो लड़के और लड़की के मूल्य में फर्क करती है। क्योंकि समस्या केवल किसी एक व्यक्ति के फैसले की नहीं, उन धारणाओं की भी है जो पीढ़ियों से चलती आती हैं। 🧠 इसलिए “Mass based education of the self” एक व्यापक समाधान के रूप में सामने आता है। ऐसी शिक्षा, जो व्यक्ति को अपनी ही धारणाओं, इच्छाओं, डर और कंडीशनिंग को देखने में सक्षम बनाए। 🔍लेकिन केवल यह देख लेना कि “मेरे भीतर यह धारणा है” पर्याप्त नहीं है। उसे देखकर उसके अनुसार चलने की नीयत भी देखने की बात है। 📚यही शिक्षा बड़े स्तर पर उस सामाजिक संरचना को बदलने की संभावना रखती है, जिसमें बच्चे का मूल्य उसके लिंग से तय किया जाता है। ❓ क्या किसी बच्चे का मूल्य तय करने से पहले हमें यह नहीं देखना चाहिए कि मूल्य तय करने वाला हमारे भीतर कौन है? 🔗 स्रोत: https://www.bhaskar.com/amp/local/mp/barwani/news/barwani-hospital-foetus-found-dog-mouth-controversy-madhya-pradesh-139231592.html https://www.unfpa.org/

















































