
जब मैं अपने आस पड़ोस, समाज और परिवार में देखती हूँ तो सोचती हूँ के कितने ऐसे घर है जहां सिर्फ दो भाई या दो बेटे हैं लेकिन ऐसे कितने जोड़े हैं जिनकी सिर्फ एक बेटी या दो बेटियां है या तीन के बाद भी मामला शांत हो गया है? महिला की जान पर बन आती हैं खुद को तोड़ तोड़ कर नई जान बनाने में लेकिन उसके परिवार और समाज को बस एक बेटा और चाहिए और वो महिला भी इतनी दोषी पाती है खुद को के मर जाऊंगी लेकिन ये गर्व का काम करके ही मरूंगी। आज भी एक पढ़ा लिखा बाप और मॉडर्न माँ अपनी दूसरी बेटी को बिल्कुल बेटी की तरह नहीं बना रही उसे बाहरी तौर पर बेटे के तरह तैयार कर रही है तो शुरुआत में देखकर ऐसा ही लगता है के इन्हें बात समझ आ गई है के सारी बात परवरिश की है मजबूती और शिक्षा की है लिंग की नहीं। लेकिन असल बात अधिकतर ये होती है के बेटे के लिए मन्नते भी ले रही हैं तो इसका मतलब है जब तक उसे बेटा नहीं हो जाता वो अपनी बेटी में अपना बेटा ढूंढ रही है? मैने आज कल ऐसे लोग भी देखे हैं जो बेटियों के लिए भी मन्नते ले रहे हैं इसलिए के उनकी पिछली पीढ़ी में भी बेटी नहीं थी लेकिन ऐसे लोग भी सिर्फ बेटी हो जाने के बाद संतुष्ट हो सकते है? कितना आसान है बेटे के बाद बेटी की चाहत रखना लेकिन क्या ये बेटे और बेटी के बीच होने वाले भेदभाव या भ्रूण हत्या जैसे मामलों में कोई भी परिवर्तन ला पा रहा है?



















