धन माया है! स्त्री माया है! घर-परिवार माया है!
निश्चित ही आपने भी इनमें से कुछ बातें अपने जीवन में सुनी होंगी। प्रचलित धर्म में हमेशा से ऐसे कुछ चुनिंदा विषयों को माया कहा गया और हमें उनसे दूरी बनाने के लिए सुझाया गया है। और इसी कारण एक आम मन सदैव इस दुविधा में रहता है - क्या छोड़ूँ और क्या पकड़ूँ?
संत कबीर के क्रांतिकारी भजन पर आधारित वीडियो सीरीज़ में आचार्य प्रशांत 'माया' की पारंपरिक और वास्तविक समझ के अंतर को स्पष्ट करते हैं। वे इस आम भ्रांति को ख़ारिज करते हैं कि माया सिर्फ़ कुछ ही विषयों तक सीमित है।
प्रस्तुत वीडियो सीरीज़ आपका ध्यान त्यागने वाले विषयों से हटाकर त्यागने वाले पर लाती है। माया कोई बाहरी वस्तु नहीं, बल्कि व्यक्ति के भीतर के झूठे ज्ञान और झूठी मान्यताओं पर टिकी होती है।
यह वीडियो सीरीज़ भजन की एक-एक पंक्ति के अर्थ के माध्यम से माया की परतों को उघाड़ती है। यह आपको माया को छोड़ने की नहीं, बल्कि माया को समझने की दिशा में ले जाती है। 'छोड़ने' और 'पाने' की अंतहीन जंग से ऊपर उठकर सहज जीवन जीने की दिशा में यह वीडियो सीरीज़ आपके लिए एक आमंत्रण है।
धन माया है! स्त्री माया है! घर-परिवार माया है!
निश्चित ही आपने भी इनमें से कुछ बातें अपने जीवन में सुनी होंगी। प्रचलित धर्म में हमेशा से ऐसे कुछ चुनिंदा...