
रिश्ता माता-पिता के साथ हो या पति-पत्नी के साथ, आमतौर पर इसे बड़ा पवित्र माना जाता है। बाहर से देखने पर भले ही इन रिश्तों में सब ठीक लगता हो, लेकिन भीतर ही भीतर स्वजनों से हमारी अधूरी रह जाने वाली अपेक्षाएँ मन को कचोटती रहती हैं।
हमारी इस बेचैनी के पीछे, जीवन का वह तीखा सच है जिसे संतजन बार-बार गाते हैं:
माया पिता, माया माता,
अतिमाया अस्तरी सुता।
कबीर साहब के भजन पर आधारित इस वीडियो सीरीज़ में आचार्य प्रशांत हमारे संबंधों की सच्चाई को बिना लाग-लपेट के सामने रखते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि हमारा स्वयं को लेकर गहरा भ्रम ही परिवार के साथ रिश्तों में दिखाई देने लगता है। इसी के चलते, रिश्तों से उम्मीदें पूरी न होने पर ये तयशुदा मानकों पर चलने लगते हैं और इनमें एक प्रकार का बनावटीपन आ जाता है।
प्रस्तुत वीडियो सीरीज़ हमारे रिश्तों में व्याप्त इसी दिखावे को उजागर करते हुए उनके पीछे का केंद्रीय भ्रम स्पष्ट करती है। इसी से रिश्तों में खुलापन आता है, जिसके आधार पर सभी के साथ गहरे से गहरा नाता बन पाता है।
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