मैकेनिक नहीं, ऑब्ज़र्वर बनो

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कबीर साहब के भजन पर आधारित
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1 घंटा 10 मिनट
हिन्दी
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परिचय
लाभ
सम्पूर्ण भजन
संरचना

जब रिश्ते उलझने लगते हैं या नौकरी बोझ बन जाती है, तब मन दो ही विकल्पों में समाधान खोजता है—या तो कुछ छोड़ देने में, या फिर कुछ अलग करने में।

ऐसा लगता है कि लोगों से दूरी बना लेने या दिनचर्या में कोई नया नियम लागू करने से यह उलझन समाप्त हो जाएगी। लेकिन बदलने और छोड़ने के इस क्रम के बाद भी, भीतर वही पुरानी उलझन नए रूप में फिर से क्यों लौट आती है?

माया तजूँ तजि नहीं जाइ,
फिर फिर माया मोहि लपटाइ

कबीर साहब के भजन पर आधारित पहली वीडियो सीरीज़ में आचार्य प्रशांत समझाते हैं कि इन उलझनों का ठीकरा बाहरी परिस्थितियों पर फोड़ देने से, या नई विधियों को आज़माने भर से कोई लाभ नहीं मिलता। वे स्पष्ट करते हैं कि बाहरी बदलावों से शांति मिल जाने का हमारा यह भ्रम ही माया है जिसे त्यागा नहीं, जाना जाता है।

यह वीडियो श्रृंखला आपको एक 'मैकेनिक' की तरह यंत्रवत जीवन जीने की मानसिकता से बाहर निकालती है और एक 'ऑब्ज़र्वर' की तरह जीवन को जानना सिखाती है। यह जानना ही आपको गलत रास्तों पर जाने से बचाकर जीवन की उलझनों के स्पष्ट समाधान की ओर ले जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

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