
ज़िंदगी एक ऐसी परीक्षा है जहाँ अधिकतर लोग ज़्यादा से ज़्यादा अंक हासिल करने की होड़ में लगे हैं। ज़्यादा पैसे हो या पद-प्रतिष्ठा, दुनिया की इन्हीं बातों को सबसे बड़ी उपलब्धि मान लिया जाता है। लेकिन अगर कोई आपसे कहे कि इस दायरे में रहकर आप चाहे जितनी मेहनत कर लें, जीवन की असली परीक्षा में आप फेल ही हो रहे हैं, तो आपको कैसा लगेगा?
माया रस, माया कर जान
माया कारनि तजे परान
कबीर साहब के भजन की ये पंक्तियाँ दुनिया के दिए हुए सफ़लता के इन पैमानों की हकीकत को आपके सामने लाती हैं। प्रस्तुत वीडियो सीरीज़ में आचार्य प्रशांत स्पष्ट करते हैं कि इन मामूली सुविधाओं और सामाजिक स्वीकृति की चाहत में वह 'रस' है, जिसके पीछे हम अपनी पूरी जान लगा देते हैं और बदले में अपना जीवन गँवा बैठते हैं। यही वह माया है जो छोटे लाभ दिखाकर हमारा सब कुछ लूट लेती है।
प्रस्तुत वीडियो सीरीज़ में आपको कुछ ऐसे व्यावहारिक प्रयोग मिलते हैं जो रोज़मर्रा के जीवन में माया को पहचानने में सहायक है। जैसे ही दिखने लगता है कि जीवन की ऊँचाइयों से हमें क्या वंचित कर रहा है, प्राथमिकताएं बदलने लगती हैं और असली बदलाव का आगमन होता है। तो कबीर साहब का हाथ थामिए और इस वीडियो सीरीज़ के माध्यम से जीवन की असली परीक्षा में खरे उतरना सीखिए।
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वीडियो श्रृंखला के सभी वीडियो-सत्र सिर्फ़ इस प्लेटफार्म पर उपलब्ध हैं। (कुछ वीडियो के कुछ हिस्से किन्हीं सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध हो सकते हैं। हालाँकि, इनकी संरचना, परीक्षण और प्रक्रियाओं के साथ पूरा पाठ्यक्रम इस प्लेटफॉर्म के अलावा कहीं और उपलब्ध नहीं है।)
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माया तजूं तजि नहिं जाइ,
फिर फिर माया मोहि लपटाइ।
माया आदर माया मान,
माया नहिं तंह ब्रह्म ज्ञान।
माया रस, माया कर जान,
माया कारनि तजे परान।
माया जप तप माया जोग
माया बाँधे सबहि लोग।
माया जल थलि माया अकासि,
माया व्यापी रही चहुं पासि।
माया पिता माया माता,
अतिमाया अस्तरी सुता।
माया मारि करै ब्योहार,
कबीर मेरे राम आधार।
~ संत कबीर
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