हम सभी जीवन में एक बेहतर मुकाम हासिल करना चाहते हैं। हमारा अहंकार भी ऊँचाई तो चाहता है, मगर सिर्फ़ अपनी शर्तों पर। नतीजा–निर्णय उलझते हैं, रिश्ते बोझिल होते हैं और भीतर एक बेचैनी बनी रहती है।
संत कबीर के प्रसिद्ध भजन की वेदान्तिक व्याख्या से आचार्य प्रशांत इसी अहंकार की परतों को खोलते हैं, जिसे हम अपनी 'स्वतंत्र इच्छा' समझ लेते हैं । वे बताते हैं कि जिसे हम अपना 'स्वभाव' कहते हैं, वो पुरानी आदतों और सामाजिक दबावों के हाथों की कठपुतली मात्र है।
आचार्य प्रशांत भजन के मर्म को समझाते हुए हमें दो केंद्रों के चुनाव पर खड़ा करते हैं:
आम केंद्र: जहाँ हम अपनी असुरक्षाओं, समाज की दी हुई झूठी इज़्ज़त और अपनी ही रची कहानियों के सहारे जीते हैं ताकि बदलना न पड़े।
राम केंद्र: वह केंद्र जहाँ जीवन की वह स्पष्टता आती है, जो हमें डरों और बाहरी पहचान के बोझ से मुक्त करती है।
5 वीडियो सीरीज़ का यह संग्रह आपको अपनी मान्यताओं को पहचानने का साहस देता है, ताकि निर्णय साफ़ हो और जीवन स्पष्टता से संचालित हो। अहंकार की परतें उतारना अकेले कठिन लगता है, लेकिन संतों का साथ इसे सुगम बना देता है।
हम सभी जीवन में एक बेहतर मुकाम हासिल करना चाहते हैं। हमारा अहंकार भी ऊँचाई तो चाहता है, मगर सिर्फ़ अपनी शर्तों पर। नतीजा–निर्णय उलझते हैं, रिश्ते बोझिल...