
चाहे बात शारीरिक सौंदर्य की हो या सामाजिक प्रतिष्ठा की, धन-दौलत की हो या ज्ञान की; दुनिया में हर कोई अपने-अपने ढंग से जीवन को सँवारने के प्रयत्न में लगा हुआ है। लेकिन सवाल यह है कि जीवन का यह निरंतर ‘श्रृंगार’ आख़िर किसके लिए किया जा रहा है?
अक्सर हमारा यह सारा प्रयास दुनिया की नज़रों में खुद को साबित करने और एक सुरक्षित पहचान बनाने तक ही सीमित रह जाता है जिससे भीतर की बेचैनी ज्यों की त्यों बनी रहती है। इसके विपरीत, संत कबीर एक ऐसे ‘श्रृंगार’ की बात करते हैं जो दुनिया के लिए नहीं, बल्कि अपनी उस उच्चतम संभावना के लिए है जिसे वे राम कहते हैं।
मैं बौरी मेरे राम भरतार,
ता कारण रचि करियो श्रृंगार
भजन पर वीडियो सीरीज़ की दूसरी कड़ी में, आचार्य प्रशांत हमारे इसी श्रृंगार को परखने का एक अचूक पैमाना सामने रखते हैं। वे समझाते हैं कि यदि हमारे कर्मों के केंद्र में ऐसी स्पष्टता हो जो हमें दुनिया के डर और बाहरी पहचान के बोझ से आज़ाद कर दे — तो जीवन का हर श्रृंगार सार्थक है। जीवन को सही मायनों में परखने की इसी कसौटी को वे 'राम केंद्र' कहते हैं। जब राम केंद्र की कसौटी पर अपने हर एक कर्म को देखा जाता है, तब एक ऊँचा और उन्मुक्त जीवन खुलने लगता है।
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