
घर के एक “पवित्र” कोने से लेकर दूर बसे तीर्थस्थलों तक, हमने राम के लिए बाहर तो कई निर्माण किए हैं। लेकिन क्या हमारे रोज़ के चुनावों में राम की झलक कहीं देखने को मिलती है?
माला तिलक पहरि मन माना,
लोगनि राम खिलौना जाना।
कबीर साहब के भजन की ये पंक्तियाँ हमें आईना दिखाती हैं कि कैसे ख़ुद को राम के तल तक उठाने के बजाय, हम राम को ही अपने तल पर गिरा लेते हैं और उन्हें अपने लिए एक 'खिलौना' बना देते हैं।
प्रस्तुत वीडियो सीरीज़ में आचार्य प्रशांत हमारी इसी भीतरी चालाकी को स्पष्ट करते हैं, जहाँ अहंकार कहानियाँ गढ़कर राम की भी एक कल्पित छवि बना लेता है ताकि उसे बदलना न पड़े। इन्हीं कहानियों में फँसकर हमारे चुनाव ऊपरी तौर पर भले ही बदल जाएँ, लेकिन केंद्र वही रहता है, जिसके कारण हमारे जीवन में कोई मूलभूत बदलाव नहीं आता।
यह वीडियो सीरीज़ आपको अपने ही द्वारा रची इन आत्मघाती कहानियों से बाहर निकालकर एक बोधपूर्ण जीवन की ओर ले जाती है जहाँ चुनाव केवल सतह पर नहीं बदलते, बल्कि उनका केंद्र ही बदल जाता है।
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