
क्या आप वाकई अपनी मर्ज़ी के मालिक हैं?
हमारा सबसे बड़ा भ्रम यह है कि हमारे पास 'स्वतंत्र इच्छा' है। हम मानते हैं कि हम जो कपड़े पहनते हैं, जो करियर चुनते हैं या जिस तरह का जीवन जीते हैं, वह हमारा अपना चुनाव है। लेकिन ज़रा गहराई से सोचें — क्या यह आपकी अपनी इच्छा है, या पुरानी आदतों, सोशल मीडिया के विज्ञापनों और "लोग क्या कहेंगे" के डर से पैदा हुई एक प्रतिक्रिया है?
जब तक आपकी इच्छा दूसरों को खुश करने या दुनिया में 'अच्छा' दिखने की कोशिश से बंधी है, तब तक वह 'स्वतंत्र' नहीं हो सकती। इसीलिए हमारे अपने ही फैसले हमें सुकून देने के बजाय एक बोझ की तरह महसूस होते हैं। लेकिन जब कोई व्यक्ति रटी-रटाई स्क्रिप्ट को छोड़कर अपने विवेक से निर्णय लेने लगता है, तो यही समाज उसे 'बौरा' घोषित कर देता है।
लोग कहें कबीर बौराना,
कबीर का मरम राम जाना।
संत कबीर के प्रसिद्ध भजन की अंतिम वीडियो सीरीज़ में, आचार्य प्रशांत हमें दिखाते हैं कि किस प्रकार हमारी अपनी लगने वाली ‘स्वतंत्र इच्छा’ भी बाहरी प्रभावों से निर्धारित होती है। यह वीडियो आपको 'अच्छा' बनने के दबाव से हटकर, उस बोध की ओर ले जाती है जहाँ आपके चुनाव किसी बाहरी प्रभाव से नहीं, बल्कि आपके अपने विवेक से संचालित होते हैं।
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