
प्रेम – लेन भी, देन भी” एक ऐसी किताब है जो प्रेम के बारे में हमारी आम धारणाओं को पूरी तरह बदल देती है। इसे पढ़ते हुए मुझे एहसास हुआ कि जिसे हम अक्सर प्रेम समझते हैं, वह कई बार सिर्फ अपेक्षाओं, जरूरतों और आसक्ति का मिश्रण होता है। किताब बहुत सरल लेकिन प्रभावशाली भाषा में यह समझाती है कि सच्चा प्रेम तभी संभव है जब व्यक्ति भीतर से पूर्ण और जागरूक हो। यह प्रेम को किसी भावना या लेन-देन के रूप में नहीं,...

व्यवहार में जिन स्वार्थों को हम प्रेम मान बैठते हैं। फिर उन्हीं का परिणाम होता है कि हम आजीवन या तो दूसरों को ठगते रहते हैं या हर कदम पर खुद ठगे जा रहे होते हैं। प्रेम स्वत: घट जाने वाली घटना नहीं है। ये बड़े ही विवेकपूर्ण निर्णय की बात है। इस पुस्तक से मैंने जाना कि मैं कहाँ-कहाँ खुद को धोखा देती हूँ जिसकी वज़ह से फिर मुझसे जुड़े बाकी रिश्ते भी प्रभावित होते हैं और जीवन दुख से भर जाता है। यह पुस्...