इस पुस्तक ने मुझे सिखाया कि प्रेम क्या नहीं है , हम अपनी पूरी जिंदगी जो प्रेम के नाम पर करते है वो प्रेम है ही नहीं
वो तो ,
निर्भरता, आकर्षण, मोह ,मलकियत है।
असली प्रेम होता है ,
प्रेम-प्रेम सब कोइ कहैं, प्रेम न चीन्है कोय।
जा मारग साहिब मिलै, प्रेम कहावै सोय॥