
व्यवहार में जिन स्वार्थों को हम प्रेम मान बैठते हैं। फिर उन्हीं का परिणाम होता है कि हम आजीवन या तो दूसरों को ठगते रहते हैं या हर कदम पर खुद ठगे जा रहे होते हैं। प्रेम स्वत: घट जाने वाली घटना नहीं है। ये बड़े ही विवेकपूर्ण निर्णय की बात है। इस पुस्तक से मैंने जाना कि मैं कहाँ-कहाँ खुद को धोखा देती हूँ जिसकी वज़ह से फिर मुझसे जुड़े बाकी रिश्ते भी प्रभावित होते हैं और जीवन दुख से भर जाता है। यह पुस्...