प्रेम का अर्थ वह नहीं है जो जगत ने बताया हैं। वह है जो इस पुस्तक के द्वारा हमें आचार्य जी ने बताया है। प्रेम ही ध्यान हैं। जो हम बुक स्टॉल पर पाते हैं। और गाते हैं।