
रोजमर्रा के काम से बीच में कुछ मनोरंजक मिल जाने को ही मैं अबतक आनन्द समझता था। लेकिन इस पुस्तक को पढ़ने के बाद समझ में आ रहा है कि आनन्द किसी क्षण में मिलने वाली चीज़ नहीं है। आनन्द हमारा स्वभाव है, हम बस फालतू चीज़ पकड़कर के बैठे है और उसमें आनन्द ढूंढते रहते है। आनन्द क्षणिक नहीं होता, आनन्द निरंतर होता है।

आनन्द पढ़ते समय मुझे यह समझ आया कि हम जिस खुशी को बाहर ढूंढते रहते हैं, वह असल में हमारी समझ की कमी का परिणाम है। यह किताब बहुत सरल लेकिन गहरी तरीके से बताती है कि सुख और आनंद में क्या अंतर है। आचार्य प्रशांत ने स्पष्ट किया है कि सुख हमेशा परिस्थितियों पर निर्भर होता है, जबकि आनंद एक ऐसी स्थिति है जो भीतर से आती है। इस बात ने मेरी सोच को काफी प्रभावित किया। पढ़ते समय कई बार ऐसा लगा जैसे मेरी अपनी ...

acharya ji sahi bol rahe hain ki dukh bahar nahi hai hamne jo pakd rakha hai wahi dukh hai jo sab sanjog se aaya hai jaise hawa chali to chali na chali to na chali koi jeevan main aaya to rahe jo kar sakte hain karenge par jab wo jayega to jaye hum rokenge bhi nahi bas itna hi karna hai ki kisi cheez ko apni jindagi nahi bana lena hai ki jab wo jaye to hamari aantarik shanti chhin jaye upar upa...

सुंदर पुस्तक👌 जरूर पढ़िए!! Key points - हमने जिंदगी से उम्मीदें बांध रखी है, पूरी न होने पर पछताते हैं, दुख उथला है हमारा, गहराई कहां है? समस्या यह है कि हम मानते ही नहीं कि हम बहुत ज्यादा बेचैन हैं और परेशान है, हम दुखी बहुत है लेकिन शर्म आती है स्वीकार करने में, इसलिए हम खुशी का आयोजन करते हैं। आनंद का रास्ता दुख की गहराइयों से होकर जाता है। दु:ख अगर गहराएगा तो अहम को टूटना पड़ेगा, जहां अहम ...