
रोजमर्रा के काम से बीच में कुछ मनोरंजक मिल जाने को ही मैं अबतक आनन्द समझता था। लेकिन इस पुस्तक को पढ़ने के बाद समझ में आ रहा है कि आनन्द किसी क्षण में मिलने वाली चीज़ नहीं है। आनन्द हमारा स्वभाव है, हम बस फालतू चीज़ पकड़कर के बैठे है और उसमें आनन्द ढूंढते रहते है। आनन्द क्षणिक नहीं होता, आनन्द निरंतर होता है।