
भीतर का पट खोल रे

जिंदगी में ऐसे पल जरूर आते हैं जब हमें लगता है कि अकेले हैं,इस अकेले पन को भरने के लिए कोई चाहिए। कभी किसी व्यक्ति को लाते हैं जिंदगी में तो कभी कोई सामान, कभी घूमना फिरना,उपभोग ,हर चीज़ करते हैं हम। अगर वो इन सबसे ही चला जाए तो बार बार इसकी जरूरत ही क्यों पड़ती है। इस बुक को पढ़ते हुए समझ आया कि वास्तव में अकेलापन क्या है,सच में कोई समस्या है या हमारे ही बनाए नियम और परंपरा इसकी वजह हैं। हर युवा...

अकेलापन और निर्भरता पढ़ते समय मुझे एहसास हुआ कि जिसे हम अकेलापन समझते हैं, वह वास्तव में हमारी अपनी अंदरूनी स्थिति का परिणाम है। यह किताब बहुत सरल भाषा में बताती है कि हम क्यों दूसरों पर भावनात्मक रूप से निर्भर हो जाते हैं और यही निर्भरता हमें भीतर से कमजोर बनाती है। आचार्य प्रशांत ने इस विषय को बहुत गहराई से समझाया है। पढ़ते-पढ़ते कई बार ऐसा लगा जैसे मेरी अपनी ही समस्याओं और भावनाओं को शब्द दिए ज...