
जिंदगी में ऐसे पल जरूर आते हैं जब हमें लगता है कि अकेले हैं,इस अकेले पन को भरने के लिए कोई चाहिए। कभी किसी व्यक्ति को लाते हैं जिंदगी में तो कभी कोई सामान, कभी घूमना फिरना,उपभोग ,हर चीज़ करते हैं हम। अगर वो इन सबसे ही चला जाए तो बार बार इसकी जरूरत ही क्यों पड़ती है। इस बुक को पढ़ते हुए समझ आया कि वास्तव में अकेलापन क्या है,सच में कोई समस्या है या हमारे ही बनाए नियम और परंपरा इसकी वजह हैं। हर युवा...

प्रीति जी, बात एक दम ठीक पकड़ी है। जो भरने से भर जाए, वो बार बार खाली क्यों होता है, यही सवाल असली है। व्यक्ति, सामान, घूमना, उपभोग, ये सब बस थोड़ी देर के लिए ध्यान भटका देते हैं, खालीपन को मिटाते नहीं। इसीलिए जरूरत लौट लौट कर आती है, क्योंकि जिससे भरा जा रहा है वो कभी उस स्तर की चीज़ ही नहीं थी। ऐसे ही पढ़ते रहिए, देखते रहिए, यही सबसे ज़रूरी काम है।
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