
MANISHA JHA
ये सारी चीजें दिखती हैं, समझ में भी आ जाती हैं लेकिन हम इतने ज्यादा Normalcy Bias हैं की सब जानते- बुझते अंजान बने रहते हैं, क्योकि हमें लगता हैं हमारा तो भाई सब सही चल रहा हैं, जो भी घटनाएं घट रही हैं वो किसी और के साथ घट रही हैं।
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ये सारी चीजें दिखती हैं, समझ में भी आ जाती हैं लेकिन हम इतने ज्यादा Normalcy Bias हैं की सब जानते- बुझते अंजान बने रहते हैं, क्योकि हमें लगता हैं हमारा तो भाई सब सही चल रहा हैं, जो भी घटनाएं घट रही हैं वो किसी और के साथ घट रही हैं।

मनीषा जी, आपने खुद लिखा, हमें लगता है भाई सब सही चल रहा है, जो हो रहा है वो किसी और के साथ हो रहा है। यहाँ गौर करने वाली बात ये है, ये वाक्य आपने खुद को शामिल करते हुए लिखा है, हम, फिर भी उसी वाक्य के भीतर ये भाई वाला किसी और वो दूरी बनी हुई है। जिस अंधेपन की बात हो रही है, उसी को लिखते हुए मन ने खुद को उस घटना से थोड़ा परे रख दिया, जैसे देख लेना ही काफी है, अंजान बने रहना बाकियों का किस्सा है। पहचान लेना और उससे मुक्त हो जाना, दो अलग बातें हैं, और नीयत ठीक इसी फासले पर पूछी जाती है।