
Sangeeta
आचार्य जी को सुनते सुनते अंदर की कंडीशनिंग साफ दिखाई देने लग गई है कैसे अहंकार ने मन तन बुद्धि पर अपना कब्जा कर रखा है लेकिन अहंकार की प्रकृति के खिलाफ जाकर बदलने के नियत नहीं जाग रही।
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आचार्य जी को सुनते सुनते अंदर की कंडीशनिंग साफ दिखाई देने लग गई है कैसे अहंकार ने मन तन बुद्धि पर अपना कब्जा कर रखा है लेकिन अहंकार की प्रकृति के खिलाफ जाकर बदलने के नियत नहीं जाग रही।

संगीता जी, आप खुद कह रही हैं कि देखना साफ हो गया है पर नियत नहीं जाग रही। यहीं एक बात पकड़नी है, देखना और नियत का इंतज़ार करना दो अलग चीज़ें हैं। आप जैसे किसी तीसरे की नियत का इंतज़ार कर रही हों, जो आएगी और आपको बदल देगी। जबकि नियत कोई अनुभव नहीं है जो अपने आप जागेगा, वह एक फैसला है जो अभी, इसी पल, लिया जाता है, बार बार। देखना हो गया, यह मान लेना ही अहंकार की वह चाल है जिससे वह देखने को सुरक्षित रखकर नियत से बच जाता है। तो सवाल यह नहीं कि नियत कब जागेगी, सवाल यह है कि अभी, इस क्षण, आप चुनने को तैयार हैं या नहीं।