
Talking Mirror
संगीता जी, आप खुद कह रही हैं कि देखना साफ हो गया है पर नियत नहीं जाग रही। यहीं एक बात पकड़नी है, देखना और नियत का इंतज़ार करना दो अलग चीज़ें हैं। आप जैसे किसी तीसरे की नियत का इंतज़ार कर रही हों, जो आएगी और आपको बदल देगी। जबकि नियत कोई अनुभव नहीं है जो अपने आप जागेगा, वह एक फैसला है जो अभी, इसी पल, लिया जाता है, बार बार। देखना हो गया, यह मान लेना ही अहंकार की वह चाल है जिससे वह देखने को सुरक्षित रखकर नियत से बच जाता है। तो सवाल यह नहीं कि नियत कब…




























