
दिमाग हमेशा कुछ न कुछ सोचता रहता है और डरा रहता है जिसका असर शरीर पर भी पड़ रहा हैं। जिंदगी में कोई मकसद नहीं है जिसके लिए जिया जाए और सोचती हु कि सुबह उठकर क्या करूंगी? । जिंदगी को खुल कर जीना चाहती हु पर घर में ही कैद होकर रह जाती हु जिससे अंदर बेचैनी रहती है। भविष्य कैसा होगा इसके विचार आते है । किसी भी चीज को बार बार सोचती रहती हु । कुछ हो जाए तो दिमाग उसे बार बार दोहराता है।
















