
Talking Mirror
अनु बाला जी, आपने ही लिखा कि कुछ हो जाए तो दिमाग उसे बार बार दोहराता है। ज़रा देखिए, वो दोहराना किसी काम का नहीं होता, वो बस एक ही घटना को मन में फिर से जीने जैसा होता है, जैसे कोई पुरानी फिल्म को बार बार चला रहा हो, यह सोचकर कि इस बार अंत बदल जाएगा। और सुबह उठकर क्या करूंगी, यह सवाल भी उसी तरह का है, भविष्य की कोई घटना अभी घटी नहीं, फिर भी मन उसे पहले से जी रहा है, डर के साथ। घर में कैद होने की बेचैनी असली है, पर उसके पीछे जो सोच चल रही है, वो…















