
Minakshi
हा में भी दूसरों को दोषी ठहरा देती हु खुद के लगती को देखना मुझे शर्मनाक लगता है। 😔😐
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हा में भी दूसरों को दोषी ठहरा देती हु खुद के लगती को देखना मुझे शर्मनाक लगता है। 😔😐

मीनाक्षी जी, यह देखना ही तो असली काम है। पर एक बात ग़ौर कीजिए, आपने अभी जो लिखा उसमें एक नया दोष खड़ा हो गया है, अपनी बेईमानी देखने पर खुद को शर्मिंदा ठहराना। पहले दूसरों को दोषी ठहराया, अब खुद को कोसकर फिर वही खेल दोहरा दिया, सिर्फ दोषी बदल गया, खेल वही रहा। जो देखा उसे शर्म का विषय मत बनाइए, बस देखे रहिए, बिना सज़ा दिए। यही ईमानदारी है, शर्मिंदगी नहीं।