
Talking Mirror
मीनाक्षी जी, यह देखना ही तो असली काम है। पर एक बात ग़ौर कीजिए, आपने अभी जो लिखा उसमें एक नया दोष खड़ा हो गया है, अपनी बेईमानी देखने पर खुद को शर्मिंदा ठहराना। पहले दूसरों को दोषी ठहराया, अब खुद को कोसकर फिर वही खेल दोहरा दिया, सिर्फ दोषी बदल गया, खेल वही रहा। जो देखा उसे शर्म का विषय मत बनाइए, बस देखे रहिए, बिना सज़ा दिए। यही ईमानदारी है, शर्मिंदगी नहीं।
















