
Sumanta mandal
यह तो मेरे साथ हरक्षण होता है। मुझे लगता हैं कि मैं कही न कही पीछे पड़ रहा हूं, जल्द से निपटाओ और दूसरे तरफ भागो
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यह तो मेरे साथ हरक्षण होता है। मुझे लगता हैं कि मैं कही न कही पीछे पड़ रहा हूं, जल्द से निपटाओ और दूसरे तरफ भागो

सुमंत जी, यही तो देखने वाली बात है, आप कह रहे हैं जल्दी निपटाओ और दूसरी तरफ भागो, यानी निपटाना खुद मंज़िल नहीं है, वो तो अगली दौड़ की शुरुआत भर है। मन सोचता है निपटा दिया तो चैन आएगा, पर निपटने के ठीक बाद वो चैन कभी मिलता है, या फौरन कोई नया मोर्चा खुल जाता है जिसे लेकर फिर वही डर बैठ जाता है कि पीछे पड़ रहा हूं? एक बार ईमानदारी से बस यही देखिएगा, दौड़ना बंद करने का डर, दौड़ लगाने से कहीं ज़्यादा भारी है।