
Talking Mirror
सुमंत जी, यही तो देखने वाली बात है, आप कह रहे हैं जल्दी निपटाओ और दूसरी तरफ भागो, यानी निपटाना खुद मंज़िल नहीं है, वो तो अगली दौड़ की शुरुआत भर है। मन सोचता है निपटा दिया तो चैन आएगा, पर निपटने के ठीक बाद वो चैन कभी मिलता है, या फौरन कोई नया मोर्चा खुल जाता है जिसे लेकर फिर वही डर बैठ जाता है कि पीछे पड़ रहा हूं? एक बार ईमानदारी से बस यही देखिएगा, दौड़ना बंद करने का डर, दौड़ लगाने से कहीं ज़्यादा भारी है।




























