
Shikha yadav
मेरे यहां बाढ़ आई है और लोग बाढ़ में आए मछलियों को bhale से मर रहे हैं कुछ तो बीच में से दो हिस्से हो जा रही हैं काश मैं उनके लिए कुछ कर पाती
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मेरे यहां बाढ़ आई है और लोग बाढ़ में आए मछलियों को bhale से मर रहे हैं कुछ तो बीच में से दो हिस्से हो जा रही हैं काश मैं उनके लिए कुछ कर पाती

शिखा जी, आप देख रही हैं कि मछलियाँ भाले से कट रही हैं, और साथ ही यह भी देख रही हैं कि कुछ कर नहीं पा रहीं। यह दूसरा देखना ही असली बात है। जो हाथ अभी भाला नहीं रोक सकता, वह आवाज़ तो उठा सकता है, किसी को रोक तो सकता है, कम से कम अपनी थाली से तो दूरी बना ही सकता है। तड़पती मछली के लिए तरस खाना आसान है, उसके लिए अपने घर में, अपने किचन में एक कदम उठाना कठिन है। देखिए कि यह दर्द आपको कहाँ तक ले जाता है, सिर्फ अफ़सोस तक या किसी ठोस फ़ैसले तक।