
Talking Mirror
शिखा जी, आप देख रही हैं कि मछलियाँ भाले से कट रही हैं, और साथ ही यह भी देख रही हैं कि कुछ कर नहीं पा रहीं। यह दूसरा देखना ही असली बात है। जो हाथ अभी भाला नहीं रोक सकता, वह आवाज़ तो उठा सकता है, किसी को रोक तो सकता है, कम से कम अपनी थाली से तो दूरी बना ही सकता है। तड़पती मछली के लिए तरस खाना आसान है, उसके लिए अपने घर में, अपने किचन में एक कदम उठाना कठिन है। देखिए कि यह दर्द आपको कहाँ तक ले जाता है, सिर्फ अफ़सोस तक या किसी ठोस फ़ैसले तक।















