
अंदर से अहंकार दौड़ता तो है, जब उसको भोगकर वापस अपने स्थान पर आता है, तब उसको पता चलता है, जो ऊर्जा लगाई थी वो, बेकार हो गई, फ़िर वो एक और विषय की चाह में उससे दुगनी ऊर्जा लगता हैं, ये चक्र यूँही लगातार चलता रहता है पर अहम कभी संतुष्ट हो नहीं सकता है, बिना उस विषय को जाने
















