
Talking Mirror
बलराम जी, आपने चक्र को सही पकड़ा है, ऊर्जा लगती है, विषय भोगा जाता है, खालीपन फिर लौट आता है, और अगली बार दुगनी ऊर्जा लगती है। पर एक बात पर ध्यान दें, आप कह रहे हैं अहम कभी संतुष्ट नहीं हो सकता बिना उस विषय को जाने। यहाँ जाने से क्या आपका मतलब है कि विषय को समझ लेने से अहम शांत हो जाएगा जबकि पोस्ट यही तो कह रही है कि विषय कोई भी हो, समझा हुआ या अनसमझा, अहम की अपूर्णता उससे नहीं मिटती। संतुष्टि का रास्ता विषय को जानने में नहीं, बल्कि यह देखने में…















