
मैं नियमित रूप से सत्र सुनती हूँ और उनसे मिली सीख भी लिखती हूँ। लेकिन उसके बाद न तो उन नोट्स को दोबारा पढ़ती हूँ, न ही सत्र में कही गई बातों पर मनन करती हूँ। जैसे ही सत्र समाप्त होता है, मेरा बही-खाता भी बंद हो जाता है। शायद यही कारण है कि मैं उन बातों की गहराई तक नहीं उतर पाती। ज्ञान केवल सुनने और लिखने तक सीमित रह जाता है; वह मेरे चिंतन, निर्णय और जीवन का हिस्सा नहीं बन पाता। जब तक किसी बात पर बार-बार मनन न हो, वह भीतर नहीं उतरती और जीवन में प…

















