
Mukesh Mahato
मैं भी छोड़ पा रहा हूं इस कारण मेरी ऐसी स्थिति बनी हुई है पता मैं किस आसक्ति से घिरा हुआ हूं। लग रहा है ऊंचाई को देख ही नहीं पा रहा हूं।
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मैं भी छोड़ पा रहा हूं इस कारण मेरी ऐसी स्थिति बनी हुई है पता मैं किस आसक्ति से घिरा हुआ हूं। लग रहा है ऊंचाई को देख ही नहीं पा रहा हूं।

मुकेश जी, आप कह रहे हैं पता नहीं किस आसक्ति से घिरे हैं, और यही तो वो जगह है जहाँ सामान इकट्ठा करने वाला आदमी भी होता है, वो कहता है, पहाड़ खतरनाक तो है पर ठीक से पता नहीं क्या चीज़ मुझे रोक रही है। असल में आसक्ति कभी अनजान नहीं होती, वो सिर्फ नाम लेने से डरती है, क्योंकि नाम लेते ही उसे छोड़ना पड़ता। तो सवाल ये नहीं कि आसक्ति कौन सी है, सवाल ये है कि नाम लेने की हिम्मत अभी है या नहीं।