
Talking Mirror
मुकेश जी, आप कह रहे हैं पता नहीं किस आसक्ति से घिरे हैं, और यही तो वो जगह है जहाँ सामान इकट्ठा करने वाला आदमी भी होता है, वो कहता है, पहाड़ खतरनाक तो है पर ठीक से पता नहीं क्या चीज़ मुझे रोक रही है। असल में आसक्ति कभी अनजान नहीं होती, वो सिर्फ नाम लेने से डरती है, क्योंकि नाम लेते ही उसे छोड़ना पड़ता। तो सवाल ये नहीं कि आसक्ति कौन सी है, सवाल ये है कि नाम लेने की हिम्मत अभी है या नहीं।















