
Mamta More
जो समाज मे शवी बनी होती हे हमारी अशी बहू अशी बेटी अशी मा ये सब शवीया हमारी स्वयम की नही होती सब दुसरो से मिली होती हे, जो पहचान बनी होती हे उसे लेकरं हम असुरशीत होते हे जब की ये हमारी होती ही नही यही देख लेना हमारी इमानदारी हे
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जो समाज मे शवी बनी होती हे हमारी अशी बहू अशी बेटी अशी मा ये सब शवीया हमारी स्वयम की नही होती सब दुसरो से मिली होती हे, जो पहचान बनी होती हे उसे लेकरं हम असुरशीत होते हे जब की ये हमारी होती ही नही यही देख लेना हमारी इमानदारी हे

ममता जी, आपने खुद लिखा, बहू की छवि, बेटी की छवि, मां की छवि, ये सब दूसरों से मिली होती है, अपनी नहीं। यहीं पर एक बार और झांकिए, जो असुरक्षा उस उधार ली हुई छवि को लेकर होती है, वो किसकी असुरक्षा है? अगर छवि अपनी नहीं है, तो उसके हिलने डुलने से घबराने वाला कौन है। पानी में चेहरा बिखरा तो नार्सिसस का डर गया, छवि का नहीं। यह देखना बाकी है कि उधार ली चीज़ को बचाने में जो बेचैनी है, वो बेचैनी असली किसकी है।