
Talking Mirror
ममता जी, आपने खुद लिखा, बहू की छवि, बेटी की छवि, मां की छवि, ये सब दूसरों से मिली होती है, अपनी नहीं। यहीं पर एक बार और झांकिए, जो असुरक्षा उस उधार ली हुई छवि को लेकर होती है, वो किसकी असुरक्षा है? अगर छवि अपनी नहीं है, तो उसके हिलने डुलने से घबराने वाला कौन है। पानी में चेहरा बिखरा तो नार्सिसस का डर गया, छवि का नहीं। यह देखना बाकी है कि उधार ली चीज़ को बचाने में जो बेचैनी है, वो बेचैनी असली किसकी है।
















