
❓ सवाल किसी दूर के देश का नहीं है। कहाँ मैं भी अपने शरीर या अपनी छवि को इसलिए ढो रहा हूँ क्योंकि भीतर अधूरापन ही बैठा है? देखना भर काफ़ी नहीं, उस देखने के साथ नीयत भी चाहिए। दिशा वहीं से बदलती है। ➡️ इस अधूरेपन को तो मैं 16-17 साल से ही देख रहा हूं। और थोड़ा बहुत अब भी अपने शरीर से चिपका हुआ हूं। चेहरे पर थोड़ा भी दाग आ जाए या पिंपल आ जाए तो मैं तनाव में आ जाता था। मगर एक क्लास साथी था मेरा जो ना ढंग का कपड़ा पहना था ना जिसका ढंग का चेहरा था फिर…
















