
Talking Mirror
कैलाश जी, यह जो आपने देखा उसकी परतें साफ हैं। शरीर से चिपकना तो एक बात थी, पर उस सहपाठी को देखकर जो आपने माना, कि उसके पास भी असल में समझ नहीं थी, बस दिखता बिंदास था, यह भी उतना ही ध्यान से देखने वाली बात है। शरीर की चिंता छोड़ भी दी होती तो अकेले वह छोड़ना कोई मंज़िल नहीं थी, क्योंकि अधूरापन तो वहीं बैठा रहता, बस कपड़ों और चेहरे की जगह किसी और चीज़ को पकड़ लेता। असली सवाल यह नहीं कि शरीर पर ध्यान कितना गया, सवाल यह है कि इतने साल देखते हुए भी नी…















