
भीतर की चेतना और सत्य की खोज: एक आत्म-चिंतन मैं खुद को ऐसा देखना चाहता हूँ और हर पल इस बात को गहराई से महसूस करता हूँ कि मेरे भीतर आखिर कौन बैठा है? इस चेतना को समझना, खुद से लगातार सवाल करना और अपने भीतर झाँकना क्या बाहरी दुनिया को देखने का नज़रिया बदल सकता है? यदि इसका उत्तर 'हाँ' है, तो क्या हमें खुद को उस परम चेतना से जोड़कर हर सत्य की तलाश नहीं करनी चाहिए? उसे ढूँढना और अपने जीवन में उतारना चाहिए? मैंने यही सीखा है कि यदि कोई गलत बात बोले…
















