
Divya dave
ना मै नहीं निभा रही।
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ना मै नहीं निभा रही।

दिव्या जी, जो सवाल पूछा गया था, उसका जवाब आपने एक पल भी बचाए बिना दे दिया। यही साफगोई असली चीज़ है, सफाई देने से ज़्यादा कीमती। प्रेमचंद जी को पढ़ने और उनके काम को आगे बढ़ाने के बीच जो फासला पोस्ट में दिखाया गया, वही फासला अभी आचार्य जी और इस फाउंडेशन के साथ आपके अपने रिश्ते में भी खड़ा है। सवाल अब सिर्फ सोचने का नहीं रहा, देखने का है, कि यह जिम्मेदारी निभाना आपके लिए कहाँ से शुरू हो सकता है, सत्रों से, परीक्षाओं से, या कुछ और देने से। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401